Sunday, May 9, 2010

सेक्स : मिथ एंड फैक्ट्स सेक्स : क्या कहते हैं रिसर्च

सेक्स के अच्छे और बुरे पक्ष को लेकर कई तरह के शोध हुए हैं। शोध कितने सही और गलत होते हैं यह हम नहीं जानते, लेकिन इनकी विश्वसनीयता पर संदेह किए जाने की जरूरत है, क्योंकि एक शोध कहता है कि नियमित सेक्स करने से व्यक्ति स्वस्थ बना रहता है और दूसरा शोध कहता है कि इससे हृदय कमजोर होता है। आयुर्वेद अनुसार तो नियमति सेक्स करना घातक माना गया है ऐसे में हम कौन से शोध की बात मानें। फिर भी आओ जानते हैं कि सेक्स पर किए गए शोधों का निष्कर्ष क्या है।

सुबह का सेक्स : ब्रिटेन के बेलफास्ट की क्वीन्स यूनिवर्सिटी में किए गए शोधानुसार सुबह-सुबह का सेक्स आपको तंदुरुस्त बनाता है। यह हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, आर्थराइटिस और माइग्रेन को कंट्रोल करता है। लेकिन धर्मशास्त्र इसकी इजाजत नहीं देते क्योंकि ब्रह्ममुहूर्त सिर्फ ब्रह्म ध्यान के लिए होता है जबकि व्यक्ति में भरपूर ऊर्जा होती है। इस ऊर्जा का ध्यान-प्रार्थना के लिए उपयोग होना चाहिए। लेकिन शोधकर्ता मानते हैं कि सुबह के सेक्स से लगभग 300 कैलोरीज खर्च होती है जिसकी वजह से डायबिटीज का खतरा कम हो जाता है।

बेस्ट सेक्स की अवधि : सेक्स से जुड़ी भ्रांतियों और असुरक्षा की भावना से मुक्त होने के लिए सेक्स संबंधी ज्ञान का होना आवश्यक है। अमेरिका के पेन्सिलवेनिया स्थित बेहरेंड कॉलेज इन एरी के शोधकर्ताओं का मानना है कि कि आमतौर पर 3 मिनट का सेक्स पर्याप्त होता है और ज्यादा देर की बात करें तो 7 से 13 मिनट का समय सबसे अधिक डिजायरेबल होता है।

सेक्स का कारण : टैक्सास विश्वविद्यालय के शोधकर्ता मानते हैं कि सेक्स के लिए प्रेरित होने के लगभग 239 कारण हैं। युवक और युवतियों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होना एक कारण है। कॉलेज में शारीरिक सुख प्राप्त करने की तीव्र इच्छा जाग्रत होने का कारण यही है, इस इच्छा के चलते लिव इन रिलेशनशिप जैसे संबंध में पनपने लगे हैं। दूसरा यह कि प्रेम की अभिव्यक्ति और लगाव जाहिर करना शुरुआती 10 कारणों में से एक है। तो क्या हम यह मानें कि प्रेम के मूल में सेक्स ही है? शोधकर्ता मानते हैं कि किसी से बदला लेने के लिए भी सेक्स सबमें अजीब कारण है। स्त्रियाँ किसी स्त्री या पति से बदला लेने के लिए भी संभोग करती है।

34 के पार महिलाएँ : ब्रिटेन में हुए शोधानुसार 34 की उम्र में महिलाएँ स्वयं को ज्यादा सेक्स ऊर्जा से लबरेज महसूस करती हैं। यह भी माना जाता है कि 28 से 34 का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। 34 की उम्र में महिलाओं में कामसुख की प्रबल इच्छा होती है। ऐसा इसलिए होता है कि योनि में होने वाली पीड़ा अथवा गर्भधारण के भय से महिलाएँ मुक्त हो जाती हैं।

नियमित सेक्स से बढ़ती है प्रजनन क्षमता : ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों द्वारा 2007 में किए गए एक अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला है कि नियमित सेक्स से न केवल शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार होता है बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता भी बढ़ती है। अध्ययन में कहा गया है कि ज्यादातर पुरुषों में शुक्राणु डीएनए को पहुँची क्षति नियमित सेक्स से दूर की जा सकती है।

आमतौर पर इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) से पहले पुरुष यह सोचकर ज्यादा सेक्स से बचते हैं कि ऐसा करने पर उनके शुक्राणु डीएनए में सामान्य से अधिक वृद्धि होगी। इस रिसर्च पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ऑस्ट्रेलियाई सेक्स विशेषज्ञों ने कहा है कि ज्यादातर ऑस्ट्रेलियाई पुरुष, सेक्स के लिए लंबा अंतराल चाहते हैं, जबकि अधिकतर महिलाओं को इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह जल्दी खत्म होता है या देर में।

सेक्स और भारतीय : सेक्स की बात करने में भारतीय शर्मीले बेशक माने जाते हों, लेकिन अपने सेक्स जीवन को जिंदादिली से जीने में वे बिल्कुल भी पीछे नहीं हैं। सन 2007 में ड्यूरेक्स ग्लोबल सेक्सुअल वेलबींग द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि 61 प्रतिशत भारतीय अपने साथी के साथ यौन संबंधों से पूरी तरह संतुष्ट हैं जबकि नाइजीरियाई लोगों की संख्या 67 फीसदी और मैक्सिको के 63 प्रतिशत लोग सेक्स जीवन से संतुष्ट हैं। इस मामले में भारतीयों ने दुनियाभर में हुए शोध में तीसरे नंबर पर बाजी मारी है।

भारतीयों के लिए सेक्स अभी भी प्राथमिकताओं में बहुत नीचे है और भारतीय जोड़े सेक्स जैसे मुद्‍दों पर आपस में खुलकर बातचीत भी नहीं करते हैं। भारतीय पुरुषों के लिए सेक्स की प्राथमिकता का क्रम अगर 17वाँ है तो महिलाओं की सूची में भी इसे 14वाँ स्थान मिला है।

ज्यादातर पुरुष पारिवारिक जीवन, माँ-पिता की भूमिका, करियर, आर्थिक सम्पन्नता, शारीरिक तौर पर बेहतरी को प्राथमिकताओं में ऊँचा स्थान देते हैं। पुरुषों की तरह से महिलाएँ भी सेक्स की तुलना में अन्य जिम्मेदारियों को अहम मानती हैं। प्रसिद्ध दवा कंपनी फाइजर ग्लोबल फार्मास्यूटिकल्स ने भारत में एक सर्वेक्षण कराया और उसके नतीजों को सार्वजनिक किया। हालाँकि सर्वेक्षण के मुताबिक यौन संतुष्टि का शारीरिक स्वास्थ्य और प्यार व रोमांस से गहरा संबंध है, लेकिन भारत में इस पर खास ध्यान नहीं दिया जाता है।

सर्वेक्षण के लिए देशभर के चार सौ इलाकों को चुना गया था, जिनमें ज्यादातर शहरी क्षेत्र थे। इस कारण से सर्वेक्षण को शहरी कहा जा सकता है, लेकिन अगर देश के ग्रामीण इलाकों में भी ऐसा कोई सर्वेक्षण किया जाता है तो उसके नतीजे अधिक अलग नहीं होंगे।

मोटापा बना झंझट : ग्रेट ब्रिटेन में करीब 3000 लोगों पर किए गए सर्वे से पता चला कि 10 में से एक महिला मोटापे का शिकार थी। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले साल भर के दौरान सेक्स में कोई भूमिका नहीं निभाई और उनकी सेक्स लाइफ काफी रूखी थी। सर्वे के अनुसार, मोटी लड़कियाँ बेडरूम में उतनी कॉन्फिडेंट नहीं हो पातीं, जितनी दुबली-पतली लड़कियाँ होती हैं। इसका मुख्य कारण है कि मोटी लड़कियाँ अपने लुक को लेकर कॉन्फिडेंट नहीं रहतीं। वे हीनभावना से ग्रस्त रहती हैं।

कपड़ों का फायदा : शोधानुसार जो लड़कियाँ दिखने में छरहरी और छोटे-छोटे कपड़े पहनती थीं, वे सेक्सुअली काफी ऐक्टिव थीं। सर्वे में शामिल 60 प्रतिशत महिलाएँ, जिनकी साइज 8 थी, ने कुछ दिन पहले ही सेक्स का आनंद उठाया था। जबकि बड़ी साइज वाली महिलाएँ लंबे समय से सेक्स से दूर थीं। सर्वे में शामिल 50 फीसदी महिलाओं की साइज 12 थी और 33 फीसदी महिलाओं की 26 साइज थी।

प्‍यार के लि‍ए नि‍कालें दो पल

दुनिया में आज कहीं धर्म के नाम पर खून खराबा हो रहा है तो कहीं अमीर बनने के लिए लोग एक-दूसरे का कत्ल करने पर उतारू हैं। हिंसा आतंकवाद और बढ़ते चरमपंथ के बीच आज प्रेम दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है लेकिन फिर भी लोगों की नासमझी के चलते यह मिल नहीं पाता ।

एक मई को मनाया जाने वाला ‘ग्लोबल लव डे’ मनुष्य को यही संदेश देता है कि वह दूसरे मनुष्यों के साथ प्रेम से रहे और दुनिया की खुशहाली में अपना योगदान दे।

भारत में लोग ‘ग्लोबल लव डे’ के नाम से बेशक परिचित नहीं हैं लेकिन अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में यह दिन काफी धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे के प्रति अपनी प्यार भरी भावनाएँ प्रदर्शित करने के लिए ग्रीटिंग कार्ड भी भेंट करते हैं जिसका अमेरिका जैसे देशों में बहुत बड़ा मार्केट है ।

समाजशास्त्री मानते हैं कि दुनिया का हर सामाजिक प्राणी कहीं न कहीं उलझा हुआ है। ऐसे में यदि वैश्विक प्रेम दिवस जैसे आयोजन उसे प्यार की बात सिखा दें तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

लव फाउंडेशन से जुड़े डैनी ने इस अवसर के लिए लिखा है कि ‘ग्लोबल लव डे’ उसे बहुत सुकून देता है। आज जब लोगों के पास किसी से बात करने के लिए भी दो मिनट का समय नहीं बचा है तो ऐसे में इस तरह के दिवस आयोजन कुछ न कुछ अहसास कराते हैं। उनका कहना है कि आदमी दुनिया में आता है और फिर चला जाता है। ऐसे में यदि वह अपने साथ लोगों का प्यार लेकर जाए तो बात कुछ और हो जाती है। इंसानों को एक-दूसरे से घृणा नहीं करनी चाहिए और प्यार के महत्व को समझना चाहिए।

यदि समाज के लोगों में प्रेम की भावना उत्पन्न हो जाए तो दुनिया में व्याप्त सभी समस्याओं का हल खुद ब खुद निकल आएगा। इसलिए ‘ग्लोबल लव डे’ जैसे दिवस काफी मायने रखते हैं।

थोड़ा प्यार, थोड़ा काम

दोस्तो, कपल्स का साथ में घूमना-फिरना, रेस्टोरेंट में समय बिताना, लाँग ड्राइव पर जाना तक तो ठीक है। खूब मजे से एंजॉय कर लेते हैं लेकिन जब कंधों पर जरा सी भी जिम्मेदारी आती है तो अधिकतर मामलों में ये ऐसे ढेर हो जाते हैं जैसे बारिश में मिट्‍टी के पुतले बह जाते हैं।

गार्डन में बैठकर अपने प्यार के लिए जान देना या चाँद-तारे तोड़कर लाने के वादे करना तो बड़ा आसान है पर हकीकत में ये वादे उस वक्त चकनाचूर हो जाते हैं जब भविष्य में आने वाली मुश्किलों से आपका पाला पड़ता है।

तो जनाब अपनी जान को तो सँभालकर रखें अपनी जानेमन के लिए। क्योंकि यदि आपने इन समस्याओं के सामने जरा भी धैर्य खोया या साहस से काम नहीं लिया तो पूरे रोमांस का मजा किरकिरा हो सकता है।

यह बात तो सच है कि प्यार करने वालों का दिल एक-दूसरे का साथ पाने के लिए हमेशा तड़पता रहता है। अक्सर वे जीवन के अहम काम और लक्ष्य भूलकर साथ-साथ समय बिताने को तरजीह देते हैं।

शायद प्यार करने वाले यह बात भूल जाते हैं कि अन्य जिम्मे‍दारियों को अनदेखा कर केवल साथ समय गुजारने से प्यार बढ़ता नहीं बल्कि घटता है। जीवन में कुछ हासिल करते हुए आगे बढ़ने से प्यार की गाड़ी भी आगे बढ़ती है। अपनी महत्वाकांक्षा तथा लक्ष्य की पूर्ति और गंभीरतापूर्ण कदम उठाना भी जरूरी है जितना कि अपने साथी को पाने की चाहत।

प्यार में सब कुछ भुलाकर केवल एक-दूसरे का साथ पाना कोई समझदारी की बात नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि प्यार करने वाले अपनी सारी खुशी का केंद्र प्रेम की दुनिया में तलाशते हैं पर सफल प्रेम का राज आपकी अन्य गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।

एक बात तो तय है कि जब हम अपनी अन्य मंजिल को गंभीरता से लेते हैं तो उस पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। चाहे परीक्षा में अच्छे अंक लाना हो, प्रतियोगिता में कोई स्थान पाना हो या फिर अपने प्रोफेशन में तरक्की करनी हो, इन सबमें अच्छा मुकाम हासिल करने के लिए हमें जी-जान लगानी होती है।

मजे की बात यह है कि जब आप इस ओर ध्यान लगाते हैं तो आपके साथी को आपका उतना समय नहीं मिल पाता है जितना कि खाली रहते हुए आप उसे देते लेकिन ऐसा करने पर उसे आपसे शिकायत नहीं होती है बल्कि आपके प्रति उसके मन में सम्मान और प्यार बढ़ता है।

यदि आप अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं तो खुद-ब-खुद आपका ‍आत्मविश्वास बढ़ जाता है। आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्ति अपने मन को शांत रखता है और ठंडे दिल से फैसला लेता है। जब आपमें यह दम-खम होता है कि आप अपनी मंजिल तक पहुँच सकते हैं तो आप अपने साथी को हौसला व ताकत देते हैं। हम खुद जितने भी मायूस से रहें पर हमें हमेशा अपना साथी ऊर्जा से भरा हुआ ही अच्छा लगता है।

दोनों को ही अपनी-अपनी मंजिलों की ओर बढ़ना चाहिए। दोनों को ही सफलता पाने की कोशिश करनी चाहिए। किसी एक से ही ऊर्जा निचोड़ने से प्यार में मजबूती नहीं मिलती है। दोनों ही पूरी शक्ति से अपना काम करते हैं और फिर समय निकालकर प्यार भी करते हैं तो प्यार का मजा दोगुना हो जाता है।

बहुत से प्रेम करने वालों का यही रोना होता है कि उनका किसी और कार्य में मन ही नहीं लगता है। पर यकीन मानिए यदि उन्हें सब कुछ छोड़कर केवल साथ रहने को कह दिया जाए तो वह बहुत जल्दी ऊब जाएँगे। किसी भी व्यक्ति की और क्या शख्सियत है, इस बात का असर भी तो हमारे प्यार पर पड़ता है।

जो व्यक्ति अपने करियर को संजीदा ढंग से लेता है, वह अपने प्यार को भी गंभीरता से लेता है। करियर में आगे बढ़ते हुए यदि प्रेम का रिश्ता बढ़ता जाता है तो इसका मतलब है वह अपने रिश्ते को लेकर भी गंभीर है। केवल खाली समय काटने का बहाना नहीं है।

आजकल देखने में आता है कि दोनों की शादी में संबंध कहीं न कहीं से आड़े आ जाते हैं। इंटरकास्ट मैरिज हो या दोनों परिवारों का स्टेंडर्ड एक-सा ना हो तो अपना जीवनसाथी बनाने में काफी दिक्कतें आती हैं। ऐसी स्थिति में भी हर तरह से दोनों को ही अपने प्रयास से परिजनों को तैयार करना होता है। उन्हें यकीन दिलाने से लेकर शादी के बाद तक उन्हें इस ढंग से जीवन गुजारने के लिए तैयार होना होता है जिससे कहीं इन दोनों को नीचा न देखना पड़े।

दोनों को ही कुछ सार्थक करते हुए प्यार में साथ-साथ चलने की गुंजाइश निकालना बहुत ही प्यारा-सा लव मंत्र है। तो साथियों, खूब दिल लगाकर अपना काम कीजिए और अपने साथी के दिल पर राज कीजिए।

प्यार की नशीली दुनिया

'मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृत बूँद है, जो मरे हुए भावों को जिन्दा करती है। यह जिन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊँची, सबसे मुबारक बरकत है।' -मुंशी प्रेमचंद

मोहब्बत एक एहसास है, जिसे रूह से महसूस किया जा सकता है। यह उस अनादि अनंत ईश्वर की तरह है, जो सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। प्यार, जो हमारे संपूर्ण जीवन में विभिन्न रूपों में सामने आता है। जो यह एहसास दिलाता है कि जिन्दगी कितनी खूबसूरत है। डॉ. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि - 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।' सृष्टि में जो कुछ सुकून भरा है, प्रेम है। प्रेम ही है, जो संबंधों को जीवित रखता है। परिवार के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी सिखाता है।

प्रेम इंसान को विनम्र बना देता है। रूखे से रूखे और क्रूर से क्रूर इंसान के मन में यदि किसी के प्रति प्रेम की भावना जन्म ले लेती है, तो संपूर्ण प्राणी जगत के लिए वह विनम्र हो जाता है। ऐसे कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मिलते हैं। प्रेम चाहे व्यक्ति विशेष के प्रति हो या ईश्वर के प्रति। आश्चर्यजनक रूप से उसकी सोच, उसका व्यवहार, उसकी वाणी सबकुछ परिवर्तित हो जाता है।

प्यार, जिन्दगी का सबसे हसीन जज्बा है। बोलने में यह जितना मीठा है, उसका एहसास उतना ही खूबसूरत और प्यारा है। प्यार के एहसास को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। उसे व्यक्त करने की आवश्यकता भी नहीं होती। व्यक्ति की आँखें, चेहरा, हाव-भाव यहाँ तक कि उसकी साँसें दिल का सब भेद खोल देती हैं।

प्रेम की अनोखी दुनिया में खोकर कोई बाहर आना ही नहीं चाहता। वह जिसे प्यार करता है, खुली आँखों से भी उसी के सपने देखता है। उसके साथ बिताई घड़ियों को बार-बार याद करता है। उसके लिए सजना-सँवरना चाहता है। यही नहीं, औरों से बात करते हुए भी उसी का जिक्र चाहता है। यही प्यार का दीवानापन है और इस दीवानेपन में जो आनंद है, वह संसार की किसी भौतिकता में नहीं है।

आज की तेज रफ्तार से दौड़ती जिन्दगी में व्यक्ति जब एक-दूसरे को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ने की होड़ में संवेदनाओं को खोता चला जा रहा है, रिश्तों और एहसासों से दूर, संपन्नता में क्षणिक सुख खोजने के प्रयास में लगा रहता है, ऐसी स्थिति में जहाँ प्यार बैंक-बैलेंस और स्थायित्व देखकर किया जाता है, वहाँ सच्ची मोहब्बत, पहली नजर का प्यार और प्यार में पागलपन जैसी बातें बेमानी लगती हैं परंतु प्रेम शाश्वत है। प्रेम सोच-समझकर की जाने वाली चीज नहीं है। कोई कितना भी सोचे, यदि उसे सच्चा प्रेम हो गया तो उसके लिए दुनिया की हर चीज गौण हो जाती है। प्रेम की अनुभूति विलक्षण है। प्यार कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। इसका एहसास तो तब होता है, जब मन सदैव किसी का सामीप्य चाहने लगता है। उसकी मुस्कुराहट पर खिल उठता है। उसके दर्द से तड़पने लगता है। उस पर सर्वस्व समर्पित करना चाहता है, बिना किसी प्रतिदान की आशा के।

जयशंकर प्रसाद ने कहा है कि 'प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है।' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती। वास्तव में प्रेम के पथ में प्रेमी और प्रिय दो नहीं, एक हुआ करते हैं। एक की खुशी दूसरे की आँखों में छलकती है और किसी के दुःख से किसी की आँख भर आती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि 'प्रेम एक संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।' प्रेम एक तपस्या है, जिसमें मिलने की खुशी, बिछड़ने का दुःख, प्रेम का उन्माद, विरह का ताप सबकुछ सहना होता है। प्रेम की पराकाष्ठा का एहसास तो तब होता है, जब वह किसी से दूर हो जाता है।

खलील जिब्रान के अनुसार- 'प्रेम अपनी गहराई को वियोग की घड़ियाँ आ पहुँचने तक स्वयं नहीं जानता।' प्रेम विरह की पीड़ा को वही अनुभव कर सकता है, जिसने इसे भोगा है। इस पीड़ा का एहसास भी सुखद होता है। दूरी का दर्द मीठा होता है। वो कसक उठती है मन में कि बयान नहीं किया जा सकता। दूरी प्रेम को बढ़ाती है और पुनर्मिलन का वह सुख देती है, जो अद्वितीय होता है। प्यार के इस भाव को इस रूप को केवल महसूस किया जा सकता है। इसकी अभिव्यक्ति कर पाना संभव नहीं है। बिछोह का दुःख मिलने न मिलने की आशा-आशंका में जो समय व्यतीत होता है, वह जीवन का अमूल्य अंश होता है। उस तड़प का अपना एक आनंद है।

प्यार और दर्द में गहरा रिश्ता है। जिस दिल में दर्द ना हो, वहाँ प्यार का एहसास भी नहीं होता। किसी के दूर जाने पर जो खालीपन लगता है, जो टीस दिल में उठती है, वही तो प्यार का दर्द है। इसी दर्द के कारण प्रेमी हृदय कितनी ही कृतियों की रचना करता है।

प्रेम को लेकर जो साहित्य रचा गया है, उसमें देखा जा सकता है कि जहाँ विरह का उल्लेख होता है, वह साहित्य मन को छू लेता है। उसकी भाषा स्वतः ही मीठी हो जाती है, काव्यात्मक हो जाती है। मर्मस्पर्शी होकर सीधे दिल पर लगती है।

प्रेम में नकारात्मक सोच के लिए कोई जगह नहीं होती। जो लोग प्यार में असफल होकर अपने प्रिय को नुकसान पहुँचाने का कार्य करते हैं, वे सच्चा प्यार नहीं करते। प्रेम सकारण भी नहीं होता। प्रेम तो हो जाने वाली चीज है। किसी के खयालों में खोकर खुद को भुला देना, उसके सभी दर्द अपना लेना, स्वयं को समर्पित कर देना, उसकी जुदाई में दिल में एक मीठी चुभन महसूस करना, हर पल उसका सामीप्य चाहना, उसकी खुशियों में खुश होना, उसके आँसुओं को अपनी आँखों में ले लेना, हाँ यही तो प्यार है। इसे महसूस करो और खो जाओ उस सुनहरी अनोखी दुनिया में, जहाँ सिर्फ सुकून है।

प्यार किया नहीं जाता...

प्यार क्या होता है, इस सवाल का जवाब मुझे नहीं मालूम था। स्कूल में सहेलियों की स्लैम बुक भरते समय अक्सर यह कॉलम खाली छोड़ दिया करती थी कि प्यार क्या होता है? काश, किसी किताब में प्यार की परिभाषा दी होती, तो मैं उसे रटकर याद कर लेती। फिर बड़ी आसानी से बताती कि प्यार क्या होता है। वैसे जब छोटी थी तो लगता था कि सोलह साल की उम्र में प्यार होता है। मैं भी सोलह साल की हुई पर मुझे तो नहीं हुआ।

जब सोलह साल की हुई तो बर्थ-डे विश करते समय कुछ लोगों ने कहा कि अहा, अब तो स्वीट सिक्‍स्‍टीन में आ गई हो। मुझे भी लगा कि स्‍वीट सिक्‍स्‍टीन यानी अब हमेशा से कुछ अलग होगा। ये क्‍या, अब भी कुछ अलग नहीं हुआ। सबकुछ वैसा ही चलता रहा जैसा था।

मस्ती तो हम क्लास में पहले भी करते थे। सोलह साल के होने के बाद भी करते रहे। बारहवीं की पढ़ाई करते-करते सोलहवाँ साल आधा बीत गया। सोलहवें साल में मैं स्कूल पास कर कॉलेज पहुँच गई। फिल्मों में देखा था कि कॉलेज में जाकर लड़कियों को प्यार हो जाता है। मुझे तो नहीं हुआ।

वैसे हमारी क्लास में प्‍यार करने वाले बहुत थे। सब उन्हें लव-बर्ड्स कहकर चिढ़ाया करते थे। यह सब देखने के बाद मैंने फैसला किया कि मैं कभी प्यार नहीं करूँगी और किया भी नहीं। सच कहूँ तो हुआ ही नहीं। फिर कभी प्यार के बारे में सोचा भी नहीं। कॉलेज खत्म होने तक स्लैम बुक के लव कॉलम भरने के लिए मेरे पास शानदार शब्द थे। लव मतलब बकवास, प्‍यार का मतलब होता है, टाइम वेस्‍ट।

समय बीतता गया और लव की फैन्टेसी दूर जाती रही। एक दिन ऑफिस में सीनियर ने विषय दे दिया कि प्‍यार पर लेख लिखो। जिसके लिए प्‍यार शब्द बकवास था, वो भला क्या लिखती? पर फिर भी काम टाला नहीं जा सकता था, इसलिए प्यार के बारे में सोचना शुरू किया।

याद आया कि एक कपल के इंटरव्यू के दौरान देखा था कि साठ वर्ष की उम्र वाले सज्‍जन कैंसर से लड़कर ठीक होने वाली अपनी पचपन साल की पत्नी को जीने का रास्ता दिखा रहे थे। वे अपनी पत्नी से बार-बार यही कहते कि तुम ठीक हो जाओ, फिर मुझे अपना एक वादा पूरा करना है। कौन-सा वादा बाकी है आपका? उनकी पत्‍नी ने पूछा, अरे भई तुम्हें योरप घुमाना है।

अब मुझे नहीं घूमना।

क्यों नहीं घूमना? मुझे पता है तुम्हें घूमना है, लेकिन तुम इस बीमारी से डर रही हो। इस बीमारी में इतनी ताकत नहीं है कि तुम्हें घूमने न दे।

जो लाड़ उस व्यक्ति की बातों में था, शायद उसे ही प्यार कहते हैं। याद आया, ऐसा प्यार तो मैंने सब्जी मंडी में भी देखा था।

सब्जी मंडी में एक डॉक्टर साहब अक्‍सर मिल जाते हैं। वो शहर के नामी डॉक्टर हैं। घर पर नौकर-चाकर जरूर होंगे। फिर हर दो-चार दिनों में जब मैं सब्जी खरीदने जाती हूँ, वो अपनी बीवी के साथ सब्जियाँ खरीदते हुए मिल जाते हैं। सब्जी का भरा हुआ झोला उनके कंधों पर टँगा रहता है। उनकी पत्‍नी केवल सब्जियाँ खरीदने में ही मगन रहती हैं। हमेशा से उन दोनों को यूँ साथ-साथ देखने की मेरी आदत हो गई थी। एक बार काम के सिलसिले में उनके क्लिनिक में मुलाकात हुई और जान-पहचान बढ़ गई।

इस परिचय के कुछ समय बाद एक दिन डॉक्टर साहब मंडी में अकेले ही सब्जियाँ खरीदते हुए नजर आए। उनका अभिवादन करते हुए मैंने सहज ही पूछ लिया कि आज आप अकेले कैसे? उन्होंने बताया कि उनकी पत्‍नी की तबीयत ठीक नहीं है।

वे बोले, सब्जियाँ छाँटने में मेरी मदद करो, मुझे सब्जी खरीदना नहीं आता है।

मैंने कहा, रोज सब्जी खरीदने के बाद भी आप कह रहे हैं कि आपको सब्जी खरीदना नहीं आता। 'मैं कहाँ खरीदता हूँ, वो खरीदती है।' '

पर, साथ तो आप भी रहते हैं न!

अपनी पत्नी की खुशी के लिए मैं कंधे पर झोला लटकाए आ जाता हूँ।

आपको झोला लटकाए देख वो खुश हो जाती है?

नहीं, मुझे झोला लटकाए देख वो खुश नहीं होती है। उसे सब्जियाँ खरीदने का शौक है। वो सब्जी खरीदकर खुश होती है, उसे खुश देखने के लिए मैं झोला टाँग लेता हूँ।

दरअसल, विनीता को पैरों में तकलीफ है। उसे अकेले सब्जी मंडी तक भेजने में मुझे डर लगता है। उसका एक ही शौक है। अब इस उम्र में वो कोई नया शौक तो पालने से रही। उसकी खुशी के लिए मैंने ही अपना टाइम मैनेज कर रखा है।

आपको अपनी पत्‍नी की इतनी फिक्र है। क्या आपकी लव मैरिज हुई थी?

अरे नहीं, हमारे समय में लव मैरिज नहीं होती थी।

फिर भी आप दोनों के बीच इतनी अच्छी अंडरस्‍टैंडिंग कैसे है?

किसने कहा, अच्छी अंडरस्‍टैंडिंग है। अक्सर वो मुझसे कहती है कि तुमने मेरे लिए क्या किया है? मैं धीरे से मुस्कुरा देता हूँ। उसे क्या पता, मैंने उसके लिए क्या किया है?

अब प्यार शब्द के मायने मुझे समझ आ रहे थे। जो समझ पाई, वो इतना ही कि प्यार को लिखा नहीं जा सकता, समझाया नहीं जा सकता, प्यार किया नहीं जा सकता, वह तो बस होता है या हो जाता है।

दिल जो न कह सका जरूरी है समय पर मन की बात कहना

हलो दोस्तो! पूरी दुनिया हमें यह अहसास कराती रहती है कि हम भारतीय बहुत ज्यादा बोलते हैं। मोबाइल फोन कंपनियों ने भी अपने अनेक अध्ययन में पाया कि हम भारतीयों का बक-बक करने में जवाब नहीं। जब तमाम तरह के अध्ययनों से यह तथ्य साबित किया जा रहा है तो वाकई भारतीय ज्यादा बोलते होंगे। यूँ तो पुरुष यही प्रचार करते रहते हैं कि औरतें ही बातूनी मशीन हैं पर इस सच्चाई से भी पुरुषों को एतराज नहीं होना चाहिए कि मोबाइल या अन्य प्रकार की फोन सुविधा जितनी पुरुषों को है उतनी महिलाओं को नहीं है। मतलब भारतीय पुरुषों को भी बातें करने में महारत हासिल है ।

फिर क्या कारण है कि जब महत्वपूर्ण बातें उन्हें करनी होती हैं तो नहीं कर पाते हैं, खासकर महिलाओं के साथ, महिलाओं से संबंधित। अंग्रेजी के एक निहायत बुजुर्ग (उम्र के लिहाज से) नामचीन लेखक ने एक बार अपने कॉलम में लिखा कि आज जब मैं कई महिलाओं को उन पर आए क्रश के बारे में बताता हूँ तो वे ये कहती हैं कि काश 50 या 60 वर्ष पहले कहा होता क्योंकि मेरे दिल में भी वही जज्बा था। मैं भी तुम्हें देखकर तड़प जाती थी। लेखक ने उन महिलाओं के सवाल पर लिखा कि मैं डरता था कि पता नहीं तुम्हारा क्या जवाब या प्रतिक्रिया हो। आगे लिखते हैं, अब मलाल करने के सिवाय चारा भी क्या है। सच अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

पर आश्चर्यजनक रूप से आज भी लाखों, करोड़ों नौजवानों की श्रीमान लेखक जैसी ही दशा है। शायद वे भी 30-40 वर्ष बाद अपनी क्रश से नहीं बल्कि किसी और के सामने अपने दिल में दबी बात को जुबाँ पर लाते हुए मिल जाएँ। बड़े लेखकों की बड़ी बात होती है। उनकी मित्र मंडली अंतिम समय तक गाहे-बगाहे मिलती-जुलती रह सकती है पर बेचारे आम नौजवान की क्रश इस दुनिया की भीड़ में कहाँ गुम हो जाएगी कौन जाने।

दरअसल, भारतीय पुरुष यूँ तो अपनी बहादुरी एवं जवाँमर्दी की खूब डींगे मारते हैं। उनकी बातें सुनो तो दफ्तर व धंधे में उससे बड़ा तीसमार खाँ कोई नहीं है। कई को तो अपने ज्ञान पर इतना घमंड होता है कि औरतों का सही लिखा हुआ भी उन्हें गलत दिखाई देता है। लड़कियों के सामने जब वे थोथे आत्मविश्वास से भरकर हाँकते हैं तो ऐसा लगता है मानो भेजे से अकल उबाल मारकर बाहर निकल आएगी पर बेचारे सामने वाली को ये नहीं बता पाते कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। मुझ पर रहम करो। पूरा समय या तो बेकार की बातों या जरूरत से ज्यादा काम की बातों में निकल जाता है और समय के साथ ही देखते ही देखते लड़की भी वहाँ से निकल जाती है।


NDतब बेचारे, संकोच के मारे यही सोचते रहते हैं काश कोई ऐसी मशीन होती जो दिल की बात उस तक बिना बोले पहुँचा देती। पर सदियों से चले आ रहे नाकाम सैदाइयों को कौन बताए कि न तो ऐसी मशीन बनी है और न ही आने वाले वर्षों में इसकी ईजाद की कोई आशा है। बेहतर यही है कि आप थोड़ा हौसला बढ़ाएँ और अपनी पसंद के सामने अपनी जुबान खोल दें। शायद भारतीय मर्दों के इसी दर्द को एक मुंबइया फिल्म में बयान किया गया है।

'हौसला और करो, मुँह से कहते न डरो, दिल न तोड़ेंगे अपना वादा है।' फिल्मों में तो बड़ी आसानी से हीरो-हीरोइनें अपना हाले दिल गाकर बयान कर डालते हैं पर वास्तविक जीवन में ये बेचारे नौजवान कैसे अपनी बात रखें ।

ज्यादातर पत्र इसी मसले को लेकर होते हैं कि निजीपन लिए संवाद कैसे शुरू किए जाएँ। हिंदी भाषी लड़के-लड़कियों के सामने तो ये समस्याएँ और भी गंभीर रूप लेकर खड़ी हो जाती हैं। लड़कों को लगता है कि कहीं लड़की की या उसके पोशाक की तारीफ कर दी और लड़की ने बुरा मान लिया तो उसकी शराफत पर ही सवालिया निशान लग जाएगा। दोस्ती की भी बलि चढ़ी सो अलग। लड़कों का डर भी बेजा नहीं लगता है क्योंकि अक्सर लड़कियाँ सहजता से मना करने के बजाय कुछ ज्यादा ही हल्ला-गुल्ला मचाने लगती हैं।

बातचीत बंद कर देना अपने परिवार और दोस्तों में बताना व मजाक उड़ाना सचमुच किसी भी लड़के को शर्मिंदगी में डाल सकता है। अब कोई बिल्कुल ही मजनुँओं वाली हरकतें करे तो उससे सावधान रहना या खौफ खाना तो सही है पर छोटी सी बात का बतंगड़ बना देना कि मुझे ऐसी-वैसी लड़की मत समझना, मैं बड़ी चरित्रवान हूँ, ऐसी हालत में बेचारे लड़कों की शामत ही आ जाती है।


किसी भी लड़की को करीब से जानने का एक ही तरीका है कि पहले उससे आम बातचीत करनी चाहिए। उसे जानने के लिए साधारण दोस्त बनने की जरूरत है। रोजाना के कामकाज से सबंधित संवाद बनाना चाहिए। शालीनता के साथ उसके साथ पेश आना चाहिए। यदि उसके प्रति आपके दिल में इज्जत है तो वह आपकी बातों और व्यवहार से भी झलक जाएगा जो आपकी दोस्ती को मजबूत करने में सहायक होगा।

समय के साथ-साथ यही दोस्ती प्यार के इजहार का साहस भी जरूर देगी। जल्दबाजी में केवल औपचारिक सी शादी होती है जिसमें सबकुछ बाहरी तौर पर जोड़-घटाव किया जाता है। जात-पात, खानदान, नौकरी, रंग-रूप, शिक्षा मैच कर गया शादी कर लो। प्रेम के लिए एक-दूसरे को समझने, पसंद करने की जरूरत होती है। इसलिए धैर्य रखें। लड़के-लड़कियों को समाज में अलग-अलग रखने के कारण दोनों ही एक-दूसरे को सशंकित ढंग से देखते हैं पर भरोसा रखें, दोनों मनुष्य हैं और यकीन मानें दोनों लगभग एक ही जैसा सोचते हैं।

पहली मुलाकात है जी...

हेलो दोस्तो! बहुत सारे युवक इस बात का ही रोना रोते रहते हैं कि उनकी किसी लड़की से दोस्ती नहीं होती है। कोई उपाय बताएँ कि कैसे वह लड़कियों से दोस्ती करें, कैसे उन्हें गर्लफ्रेंड बनाएँ। पर जब किसी लड़की से दोस्ती हो जाती है तब फिर यह विकट समस्या सामने आती है कि एकांत में वह उनसे कैसे और क्या संवाद बनाएँ।

युवती दोस्त के साथ कई लोगों के बीच बातचीत करना, हँसी-मजाक करना और थोड़ा रूमानियत का अहसास करना एक बात है लेकिन उसी के साथ एकांत में संवाद बनाना बिल्कुल अलग।

किसी लड़की द्वारा अपने लड़के दोस्त का यह प्रस्ताव मान लेना ही काफी नहीं है कि वह उसके साथ डेट पर जाने को तैयार है। यूँ तो किसी भी रिश्ते की यह पहली बड़ी सफलता मानी जाएगी पर इसे बहुत ही संकट का समय भी माना जाएगा। अगर युवती किन्हीं कारणों से अपने मित्र से प्रभावित नहीं हुई तो इस रिश्ते को यहीं पर पूर्ण विराम लग सकता है। पहली डेटिंग ही अंतिम डेटिंग बन सकती है।

लड़कों का डरना और दुविधा में रहना भी स्वाभाविक है। यूँ तो लड़के और लड़कियाँ मनुष्य ही हैं पर अलग माहौल में परवरिश के कारण दोनों के सोचने-समझने का तरीका भिन्न होता है। इसी वजह से दोनों ही कई बार नए माहौल में सशंकित से रहते हैं। अधिकतर मामले में पहली डेट पर पूरी जिम्मेदारी लड़कों की हो जाती है कि वह कैसे उस शाम या समय को खुशगवार बनाए रखें।

सबसे पहला संकट यह आता है कि आखिर बात कहाँ से शुरू की जाए। ऐसे वाक्य से संवाद शुरू करना चाहिए जो ज्यादा भारी-भरकम न हों और जवाब देने वाले को भी कोई जोखिम महसूस न हो। जैसे, 'आज का दिन कैसा बीता?' बहुत ही उचित प्रश्न है उस मौके के लिए। इस बात पर वह आसानी से बात शुरू कर सकती है और बहुत कुछ बताने को हो भी सकता है। माहौल सहज करने के लिए ऐसा प्रश्न करना और फिर धैर्य से पूरा जवाब सुनने के बाद थोड़ा अपना अनुभव भी बताना अनुकूल हो सकता है।

अब आप थोड़ा निजीपन की ओर बढ़ सकते हैं। संभ्रांत और सौम्य आवाज और भाषा में अपनी डेट की पोशाक के चयन की सराहना कर सकते हैं। रंगों की तारीफ करते हुए आप हौले से बता सकते हैं कि यह उस पर फब रहा है। उनके पूरे गेटअप और केश सज्जा की भी प्रशंसा कर सकते हैं।


NDहो सकता है उन्होंने ऐसी जींस और टॉप पहनी हो जो आपकी निगाह में उतना अच्छा न लग रहा हो फिर भी आपको उसकी तारीफ ही करनी चाहिए। आपकी यह प्रशंसा उन्हें आश्वस्त और सहज कर देगी। यह पूरी बातचीत इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इस पहली डेट के लिए उसने अतिरिक्त कोशिश की है।

सजने-संवरने में समय लगाया है। वैसे तो आपने भी तैयार होने में मेहनत की है और आपको उसकी दाद भी जरूर मिलेगी। कई बार लड़कियाँ ऐसी बातों में पहल करने से कतराती हैं लेकिन सहज और सही माहौल मिलने पर बहुत ही आसानी से ऐसी बातों में हिस्सा ले सकती हैं।

खाने-पीने के बीच ही उसकी पसंद के खाने पर जानते हुए बोलना चाहिए, 'सच यह बहुत ही प्यारा समय है मेरे लिए, इतना खूबसूरत लम्हा बीतेगा, इतना अच्छा लगेगा मिलकर बैठने पर यह मैंने नहीं सोचा था।' ऐसी बातों से आपकी 'डेट' बहुत खुश होगी। और अब आप किसी अन्य विषय पर बातचीत शुरू कर सकते हैं। यहाँ लड़कों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि अमूमन लड़के, लड़कियों को कम अक्लमंद समझते हैं पर यह विचार बहुत ही खतरनाक है, इसे भाँपते ही आपकी 'डेट' आपसे दूर हो जाएगी।

कई लड़कियाँ इतनी हाजिरजवाब और जहीन होती हैं कि आपकी पुरुषवादी सोच को जानते ही आपको अलविदा कह देंगी और आपका मजाक भी उड़ाएँगी। इसलिए संवाद बनाते समय अपनी डेट को भी अपने बराबर ही समझें। विषय पर बात करते समय यदि नया नजरिया सामने आता है तो उसे सराहें और बताएँ कि यह दृष्टिकोण बिल्कुल नया है।

अगर अहं को सामने रखकर आप असहज होने लगेंगे और तारीफ करने से मैं छोटा हो जाऊँगा, ऐसा समझेंगे तो यह मान लें कि रिश्ता हाथ से गया। तारीफ में हमेशा सच्चाई झलकनी चाहिए। बनावटीपन से काम नहीं बनता। आपकी डेट को भी सच और ढोंग का अहसास हो जाएगा।

इस पूरी बातचीत का आधार यह होना चाहिए कि आप दोनों ज्यादा सहज हों, अच्छा महसूस करें, एक दूसरे के बारे में थोड़ी निजी बातें भी जान पाएँ। इसे बिलकुल परीक्षा वाला समय नहीं बना देना चाहिए। बहुत ज्यादा निजी सवाल भी नहीं करना चाहिए। अगर आपने सावधानी के साथ यह पहली डेट पार कर ली तो निश्चित ही अगली कई डेट आपकी होंगी।